
अरावली की परिभाषा स्पष्ट होने तक जंगल सफारी परियोजना पर रोक: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि वह ''किसी को भी अरावली की पहाड़ियों को छूने'' की अनुमति नहीं देगा। पीठ ने कहा कि हम विशेषज्ञ नहीं हैं। अरावली की परिभाषा विशेषज्ञ तय करेंगे।
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को हरियाणा सरकार को तगड़ा झटका देते हुए उसकी बहुचर्चित ‘अरावली जंगल सफारी परियोजना’ पर रोक जारी रखी है। अदालत ने साफ कहा कि जब तक विशेषज्ञ यह स्पष्ट नहीं करते कि ‘अरावली रेंज’ की वैज्ञानिक और पर्यावरणीय परिभाषा क्या है, तब तक वह इस पर्वतमाला को कोई छू भी नहीं सकता।
पीठ ने इसपर टिप्पणी की, ”कभी-कभी, सीईसी अनुमति देने में बहुत चुनिंदा रवैया अपनाता है। अगर हम इसकी अनुमति देते हैं, तो वे बहुत ही आकर्षक तस्वीर पेश करेंगे कि ये पेड़, वन्यजीव और जंगल हैं।” सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि विशेषज्ञ समिति की राय आने के बाद वह सफारी परियोजना पर विचार करेगी। शीर्ष अदालत ने पिछले साल अक्टूबर में प्रस्तावित ‘अरावली जंगल सफारी परियोजना’ पर रोक लगा दी थी, जिसे हरियाणा सरकार द्वारा दुनिया का सबसे बड़ा जू-सफारी बताया जा रहा था।”
‘जू सफारी’ परियोजना का उद्देश्य गुरुग्राम और नूहं जिलों में स्थित पर्यावरण की दृष्टि से नाजुक अरावली पर्वत शृंखला के 10,000 एकड़ क्षेत्र में बाघ, तेंदुआ,शेर के लिए क्षेत्र स्थापित करना और सैकड़ों प्रजातियों के पक्षियों, सरीसृपों और तितलियों को आश्रय देना है। सुप्रीम कोर्ट भारतीय वन सेवा (IFS) के सेवानिवृत्त पांच अधिकारियों और गैर सरकारी संगठन ‘पीपल फॉर अरावली’ द्वारा संयुक्त रूप से दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें आरोप लगाया गया था कि यह परियोजना पहले से ही क्षतिग्रस्त अरावली पर्वत शृंखला के लिए विनाशकारी साबित होगी।
शीर्ष अदालत ने 29 दिसंबर को अरावली की नई परिभाषा पर हुए विवाद के बाद अपने 20 नवंबर के अपने निर्देशों को स्थगित कर दिया, जिसमें इन पहाड़ियों और पर्वत शृंखलाओं की एक समान परिभाषा को स्वीकार किया गया था। न्यायालय ने कहा कि ”महत्वपूर्ण अस्पष्टताओं” को दूर करने की आवश्यकता है, जिसमें यह भी शामिल है कि क्या 100 मीटर की ऊंचाई और पहाड़ियों के बीच 500 मीटर की दूरी का मानदंड इस पर्वत श्रृंखला के एक महत्वपूर्ण हिस्से को पर्यावरण संरक्षण से वंचित कर देगा।
पिछले साल अक्टूबर में सर्वोच्च न्यायालय ने हरियाणा सरकार के प्रस्तावित मेगा ‘अरावली ज़ू सफारी प्रोजेक्ट’ पर रोक लगा दी थी, जिसे दुनिया का सबसे बड़ा ज़ू-सफारी बताया जा रहा था।
ज़ू सफारी प्रोजेक्ट का मकसद गुड़गांव और नूह ज़िलों में इको-फ़्रेजाइल अरावली रेंज में 10,000 एकड़ के एरिया में बाघ, जगुआर, तेंदुए के जोन बनाना और सैकड़ों तरह के पक्षियों, रेप्टाइल्स और तितलियों को बसाना है।
सुप्रीम कोर्ट गुरुवार को पांच रिटायर्ड इंडियन फॉरेस्ट सर्विस ऑफिसर और एनजीओ ‘पीपल फॉर अरावली’ की तरफ से मिलकर फाइल की गई एक पिटीशन पर सुनवाई कर रहा था। पिटीशन में आरोप लगाया गया था कि यह प्रोजेक्ट पहले से ही खराब अरावली रेंज के लिए तबाही लाएगा।

