
एसआईआर के विरोध में मताधिकार रक्षा सम्मेलन
दिल्ली कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में अखिल भारतीय मताधिकार रक्षा सम्मेलन का आयोजन हुआ, जिसमें प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव, मशहूर अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज़ और लेखिका निवेदिता मेनन शामिल हुई।
निवेदिता मेनन ने कहा, “बहुत सारी गलतियां हो रही हैं। लोगों के नाम नहीं हैं, जो जिंदा हैं उन्हें मृत घोषित किया जा रहा है। ये सारी गलतियां जल्दबाजी की वजह से नहीं हो रही हैं, जल्दबाजी से एसआईआर कराया जा रहा है ताकि ये गलतियां हों।” उन्होंने कहा, “एसआईआर के पीछे एक मकसद है और वो मकसद है कि इस सरकार को अगले 100 साल बैठे रहना है।”
वहीं ज्यां द्रेज़ ने कहा, “अगर यह लगता है कि मतदाता सूची में गड़बड़ी है, तो सबसे पहले जनगणना की जानी चाहिए। जनगणना होने से यह पता चलेगा कि किस गाँव में किस आयु-वर्ग के कितने लोग रहते हैं। इस जानकारी को मतदाता सूची से जोड़कर उसकी जाँच की जा सकती है। फिर SIR की इतनी जल्दबाज़ी क्यों?”
योगेंद्र यादव सम्मेलन के दौरान बोले, “SIR कोई मतदाता सूची की सुधार प्रक्रिया नहीं है। खाली कागज़ पर नई मतदाता सूची तैयार की जा रही है। यह पुराने SIR की पुनरावृत्ति नहीं है। ऐसी SIR पहले कभी नहीं हुई। 2002–03 में मतदाता सूची में दर्ज व्यक्ति से कभी भी फॉर्म भरने को नहीं कहा गया था। केवल नए मतदाता को फॉर्म भरना पड़ता था। मतदाता सूची में बने रहने के लिए फॉर्म भरना आवश्यक नहीं था। बल्कि नाम एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरित करना हो, तभी फॉर्म भरना पड़ता था।”
पूर्व CEC एस.वाई. कुरैशी ने बताया कि देश में पहला एसआईआर 2003 में हुआ था। उसके बाद 2003-04 में चुनाव आयोग ने यह स्पष्ट फैसला लिया था कि वोटर रोल के डिजिटलीकरण के बाद आगे SIR की जरूरत नहीं पड़ेगी। डिजिटल वोटर लिस्ट को केवल वार्षिक संशोधन के जरिए अपडेट किया जाएगा, जिसमें मृत्यु, माइग्रेशन, नए मतदाता और 18 वर्ष की आयु पूरी करने वालों को जोड़ा-घटाया जाएगा। यही प्रक्रिया पिछले 25 वर्षों से अपनाई जा रही थी।

