श्रीकृष्ण के गिरधारी स्वरूप का होगा पूजन, लगेगा छप्पन भोग

गोवर्धन पूजा, दीपावली के बाद मनाया जाने वाला महत्वपूर्ण पर्व है, जिसकी जड़ें पौराणिक कथाओं और ग्रामीण परंपराओं में गहराई से जुड़ी हैं. यह पूजा श्रीकृष्ण द्वारा इंद्र की वैदिक पूजा के विरोध में स्थापित की गई थी, जिसमें प्रकृति, पशुधन और गोवर्धन पर्वत की पूजा की जाती है.

दीपावली के एक दिन के बाद आज परवा यानी प्रथमा तिथि को गोवर्धन पूजा मनाई जा रही है. पांच दिन की पर्व परंपरा में ये ऐसा पहला त्योहार है, जिसका वैदिक आधार तो स्पष्ट नहीं है, लेकिन इसकी मान्यताएं सीधे पौराणिक कथाओं से निकल कर सामने आई हैं. गोवर्धन पूजा का जिक्र श्रीमद्भभागवत पुराण, महाभारत और हरिवंश पुराण में मिलता है.
भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित यह पूजा असल में विशुद्ध ग्रामीण परंपरा की पूजा पद्धति की झलक है. जिसे समुदाय, संगठन या फिर एक परिवेश के लोगों के द्वारा मिलजुल कर किया जाता है.
गोधन से ही जीवन यापन के लिए दूध-दही, घी मिलता है. पशुधन किसान के बराबर ही मेहनत करते हैं ताकि अनाज उगाया जा सके. धरती अपने सीने पर हल की नोक सहकर भी बीज उत्पादन कर अनाज देती है. वृक्ष पत्थर मारने पर भी फल देते हैं और गोवर्धन ब्रज क्षेत्र की सीमा बनकर सुरक्षा देता है. वर्षा होने में सहायक होता है.
श्रीकृष्ण ने आठ दिन के पर्व की नींव डाली थी. जिसमें परवा (प्रथमा) के दिन गोवर्धन पूजा से लेकर कार्तिक शुक्ल अष्टमी के दिन गोपाष्टमी तक के पर्व शामिल थे. ब्रजवासी आठ दिनों तक प्रकृति की पूजा का उत्सव मनाते थे, जिसमें अन्न, नदी, जंगल, धरती और उनके पशुधन शामिल थे.
आज गोवर्धन पूजा श्रीकृष्ण के उसी गिरधारी स्वरूप के स्मरण का दिन है. गोवर्धन पर्वत अब खुद में एक लोकदेवता हैं. वह कई अलग-अलग परिवारों के कुल देवता भी हैं. ऐसा भी मानते हैं कि श्रीकृष्ण ही अपने अचल स्वरूप में गोवर्धन पर्वत हैं. मथुरा के ब्रज क्षेत्र से लेकर राजस्थान की नाथ परंपरा तक में गिरधारी स्वरूप की बड़ी मान्यता है, जो पश्चिमी उत्तर प्रदेश से निकल कर, राजस्थान, गुजरात और फिर महाराष्ट्र के सागरीय तट तक पहुंचती है. जिसमें स्वरूप कोई भी हो, मूलरूप से श्रीकृष्ण की ही पूजा होती है.

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