
मोहब्बत का एक अंदाज है “हक-ए-नमक”
इसे "हक-ए-नमक" इसलिए कहा जाता है क्योंकि पत्नी ने पूरे रमज़ान भर पति और परिवार के लिए इफ्तार और सहरी का इंतज़ाम किया होता है। यह तोहफा उनके प्रति आभार और प्यार जताने का एक तरीका है।
तुर्की की एक बहुत ही खूबसूरत और पुरानी सांस्कृतिक परंपरा है, जिसे ओटोमन (उस्मानी) काल से जोड़ा जाता है। *इसे “हक-ए-नमक” या “नमक का तोहफा” कहते हैं, जो ईद के दिन दिया जाता है* ।
ईद-उल-फितर की सुबह जब मर्द ईदगाह से घर लौटते थे, तो बीवियां उन्हें क़हवा पेश किया करती थीं।जिसे पीने के बाद वह खाली कप लौटाने के बजाय उसमें सोने की अंगूठी या कोई तोहफ़ा रख देते थे और बेगम को तोहफे के रूप में पेश करते थे। इसे “हक़ नमक” कहा जाता था।
ऐसा रमज़ान के महीने में सहरी और इफ्तार के दौरान बेगम और घर की ख्वातीन की तैयारियों और खिदमात की वजह से होता था। यह
तोहफा मर्द हज़रत कि तरफ़ से शुक्रिया का प्रतीक होती थी।
सूडान, लीबिया, सीरिया और अफ्रीक़ा के कुछ इलाक़ों में “हक़ नमक” आज भी प्रचलित है।
लेकिन हम हिन्दुस्तानी ख्वातीन अभी इससे मेहरूम हैं। और इस बात से खुश हैं कि हमारी मोहब्बत भरी खिदमत से ईद की खुशियां और बढ़ जाती है

